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mahabharat 11.2.35: मनुष्य अपना मित्र, शत्रु स्वयं ही है और वह स्वयं ही अपने अच्छे-बुरे कर्मों का साक्षी है ॥35॥   |   mahabharat अध्याय 11.2: विदुरजीका राजा धृतराष्ट्रको समझाकर उनको शोकका त्याग करनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 2: विदुरजीका राजा धृतराष्ट्रको समझाकर उनको शोकका त्याग करनेके लिये कहना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  11.2.35 
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।
आत्मैव ह्यात्मन: साक्षी कृतस्यापकृतस्य च॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य अपना मित्र, शत्रु स्वयं ही है और वह स्वयं ही अपने अच्छे-बुरे कर्मों का साक्षी है ॥35॥
 
Man is his own friend, his own enemy and he himself is the witness of his own good and bad deeds. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)