श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 2: विदुरजीका राजा धृतराष्ट्रको समझाकर उनको शोकका त्याग करनेके लिये कहना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  11.2.17 
शरीराग्निषु शूराणां जुहुवुस्ते शराहुती:।
हूयमानान् शरांश्चैव सेहुस्तेजस्विनो मिथ:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने वीर योद्धाओं के शरीररूपी अग्नि में अपने बाणों की आहुति दी है और उन महारथियों ने एक-दूसरे के शरीररूपी अग्नि में अर्पित किए गए बाणों को सहन किया है॥17॥
 
They have offered their arrows as sacrifices in the fires of the bodies of valiant warriors, and those illustrious heroes have endured the arrows offered in the fires of each other's bodies.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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