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mahabharat 11.15.40-43h: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! गांधारी ने अपनी पुत्रवधू द्रौपदी तथा यशस्वी कुंती से कहा - 'पुत्री! तुम शोक से इतनी व्याकुल मत हो। देखो, मैं भी शोक में डूबी हुई हूँ। मैं समझती हूँ कि यह सम्पूर्ण जगत् काल के चक्रव्यूह के कारण नष्ट हो गया है, जो स्वभाव से ही रोमांचकारी है। यह घटना अवश्यंभावी थी, इसीलिए घटित हुई है। जब श्रीकृष्ण का संधि हेतु अनुनय-विनय सफल नहीं हुआ, उस समय परम बुद्धिमान विदुरजी ने जो महत्त्वपूर्ण बात कही थी, उसी के अनुसार यह सब कुछ प्रकाश में आया है।'   |   mahabharat अध्याय 11.15: भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना, युधिष्ठिरका अपना अपराध स्वीकार करना, गान्धारीके दृष्टिपातसे युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना, अर्जुनका भयभीत होकर श्रीकृष्णके पीछे छिप जाना, पाण्डवोंका अपनी मातासे मिलना, द्रौपदीका विलाप, कुन्तीका आश्वासन तथा गान्धारीका उन दोनोंको धीरज बँधाना   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 15: भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना, युधिष्ठिरका अपना अपराध स्वीकार करना, गान्धारीके दृष्टिपातसे युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना, अर्जुनका भयभीत होकर श्रीकृष्णके पीछे छिप जाना, पाण्डवोंका अपनी मातासे मिलना, द्रौपदीका विलाप, कुन्तीका आश्वासन तथा गान्धारीका उन दोनोंको धीरज बँधाना  »  श्लोक 40-43h
 
 
श्लोक  11.15.40-43h 
वैशम्पायन उवाच
तामुवाचाथ गान्धारी सह वध्वा यशस्विनीम्॥ ४०॥
मैवं पुत्रीति शोकार्ता पश्य मामपि दु:खिताम्।
मन्ये लोकविनाशोऽयं कालपर्यायनोदित:॥ ४१॥
अवश्यभावी सम्प्राप्त: स्वभावाल्लोमहर्षण:।
इदं तत् समनुप्राप्तं विदुरस्य वचो महत्॥ ४२॥
असिद्धानुनये कृष्णे यदुवाच महामति:।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! गांधारी ने अपनी पुत्रवधू द्रौपदी तथा यशस्वी कुंती से कहा - 'पुत्री! तुम शोक से इतनी व्याकुल मत हो। देखो, मैं भी शोक में डूबी हुई हूँ। मैं समझती हूँ कि यह सम्पूर्ण जगत् काल के चक्रव्यूह के कारण नष्ट हो गया है, जो स्वभाव से ही रोमांचकारी है। यह घटना अवश्यंभावी थी, इसीलिए घटित हुई है। जब श्रीकृष्ण का संधि हेतु अनुनय-विनय सफल नहीं हुआ, उस समय परम बुद्धिमान विदुरजी ने जो महत्त्वपूर्ण बात कही थी, उसी के अनुसार यह सब कुछ प्रकाश में आया है।'
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Gandhari said to her daughter-in-law Draupadi and the famous Kunti - 'Daughter! Do not be so distraught with grief. Look, I am also immersed in sorrow. I understand that this entire world has been destroyed due to the twists and turns of time, which is thrilling by nature. This incident was inevitable, that is why it has happened. When Shri Krishna's persuasion for making a treaty did not succeed, at that time the most intelligent Vidurji had said something important, according to that only all this has come to light. 40-42 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)