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श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 15: भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना, युधिष्ठिरका अपना अपराध स्वीकार करना, गान्धारीके दृष्टिपातसे युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना, अर्जुनका भयभीत होकर श्रीकृष्णके पीछे छिप जाना, पाण्डवोंका अपनी मातासे मिलना, द्रौपदीका विलाप, कुन्तीका आश्वासन तथा गान्धारीका उन दोनोंको धीरज बँधाना  »  श्लोक 38-40h
 
 
श्लोक  11.15.38-40h 
तां समाश्वासयामास पृथा पृथुललोचना॥ ३८॥
उत्थाप्य याज्ञसेनीं तु रुदतीं शोककर्शिताम्।
तयैव सहिता चापि पुत्रैरनुगता नृप॥ ३९॥
अभ्यगच्छत गान्धारीमार्तामार्ततरा स्वयम्।
 
 
अनुवाद
हे नरदेव! कुंती ने बड़ी-बड़ी आँखों से शोक से रोती हुई द्रुपद की पुत्री को उठाया और उसे सांत्वना दी। उसके साथ वह स्वयं भी अत्यन्त दुःखी गांधारी के पास गईं। उस समय उनके पुत्र पांडव भी उनके पीछे-पीछे गए।
 
Lord of men! Kunti with big eyes picked up the daughter of Drupada who was weeping in grief and consoled her. Along with her she herself went to the grieving Gandhari in great pain. At that time her sons Pandavas also followed them. 38-39 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)