श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 15: भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना, युधिष्ठिरका अपना अपराध स्वीकार करना, गान्धारीके दृष्टिपातसे युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना, अर्जुनका भयभीत होकर श्रीकृष्णके पीछे छिप जाना, पाण्डवोंका अपनी मातासे मिलना, द्रौपदीका विलाप, कुन्तीका आश्वासन तथा गान्धारीका उन दोनोंको धीरज बँधाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  11.15.2 
अधर्मो यदि वा धर्मस्त्रासात् तत्र मया कृत:।
आत्मानं त्रातुकामेन तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘माता! यह अधर्म है या धर्म; मैंने तो वहाँ केवल दुर्योधन के भय से अपने प्राण बचाने के लिए ऐसा किया था; अतः आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें॥ 2॥
 
‘Mother! Whether this is adharma or dharma; I did this there only to save my life out of fear from Duryodhan; therefore, please forgive me for that crime.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)