श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 12: पाण्डवोंका धृतराष्ट्रसे मिलना, धृतराष्ट्रके द्वारा भीमकी लोहमयी प्रतिमाका भंग होना और शोक करनेपर श्रीकृष्णका उन्हें समझाना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  11.12.1-2 
वैशम्पायन उवाच
हतेषु सर्वसैन्येषु धर्मराजो युधिष्ठिर:।
शुश्रुवे पितरं वृद्धं निर्यान्तं गजसाह्वयात्॥ १॥
सोऽभ्ययात् पुत्रशोकार्त: पुत्रशोकपरिप्लुतम्।
शोचमानं महाराज भ्रातृभि: सहितस्तदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन जी कहते हैं - राजा जनमेजय! समस्त सेनाओं के नष्ट हो जाने पर जब धर्मराज युधिष्ठिर ने सुना कि उनके वृद्ध चाचा युद्ध में मारे गये योद्धाओं का अन्तिम संस्कार करने के लिए हस्तिनापुर से चले गये हैं, तब वे स्वयं पुत्र शोक से आकुल होकर अपने समस्त भाइयों के साथ पुत्र शोक में डूबे हुए राजा धृतराष्ट्र के पास गये।
 
Vaishmpayana says - King Janamejaya! After the destruction of all the armies, when Dharmaraja Yudhishthira heard that his old uncle had left Hastinapur to perform the last rites of the warriors who had died in the war, then he himself, overwhelmed with grief for his sons, went to King Dhritarashtra, who was lost in grief for his sons, along with all his brothers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)