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mahabharat 11.1.44: वैशम्पायनजी कहते हैं - हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले जनमेजय! जब महात्मा संजय ने राजा धृतराष्ट्र को इस प्रकार आश्वासन दिया, तब विदुरजी ने भी पुनः यही विचारपूर्ण वचन कहकर उन्हें सान्त्वना दी ॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 11.1: धृतराष्ट्रका विलाप और संजयका उनको सान्त्वना देना   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 1: धृतराष्ट्रका विलाप और संजयका उनको सान्त्वना देना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  11.1.44 
वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वासितस्तेन संजयेन महात्मना।
विदुरो भूय एवाह बुद्धिपूर्वं परंतप॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले जनमेजय! जब महात्मा संजय ने राजा धृतराष्ट्र को इस प्रकार आश्वासन दिया, तब विदुरजी ने भी पुनः यही विचारपूर्ण वचन कहकर उन्हें सान्त्वना दी ॥ 44॥
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya, who torments the enemies! When the great soul Sanjaya thus assured the king Dhritarashtra, then Vidur too once again consoled him by saying these thoughtful words to him. ॥ 44॥
 
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)