श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 1: धृतराष्ट्रका विलाप और संजयका उनको सान्त्वना देना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  11.1.40 
त्वयैव ससुतेनायं वाक्यवायुसमीरित:।
लोभाज्येन च संसिक्तो ज्वलित: पार्थपावक:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
आपने अपने पुत्र के साथ मिलकर पार्थ रूपी अग्नि को लोभ रूपी घी से सींचकर तथा अपने वचन रूपी वायु से प्रेरित करके प्रज्वलित किया था।
 
‘You, along with your son, had kindled the fire in the form of Partha by watering it with the ghee of your greed and inspiring it with the wind of your words.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)