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श्लोक 11.1.38  |
अर्थान्न शोचन् प्राप्नोति न शोचन् विन्दते फलम्।
न शोचन् श्रियमाप्नोति न शोचन् विन्दते परम्॥ ३८॥ |
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| अनुवाद |
| ‘शोक करनेवाला मनुष्य अपनी इच्छित वस्तुएँ नहीं पाता, शोक से युक्त मनुष्य किसी भी फल को प्राप्त नहीं कर सकता। शोक करनेवाला मनुष्य न तो धन को प्राप्त करता है और न ही भगवान को॥38॥ |
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| ‘A person who grieves does not get the things he desires, a person who is full of grief cannot achieve any fruit. A person who grieves neither attains wealth nor God.॥ 38॥ |
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