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श्लोक 11.1.35  |
आदावेव मनुष्येण वर्तितव्यं यथाक्षमम्।
यथा नातीतमर्थं वै पश्चात्तापेन युज्यते॥ ३५॥ |
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| अनुवाद |
| मनुष्य को प्रारम्भ से ही उचित आचरण करना चाहिए, जिससे उसे बाद में अतीत के लिए पश्चाताप न करना पड़े॥ 35॥ |
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| ‘A man must behave appropriately from the beginning, so that he need not repent for the past later.॥ 35॥ |
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