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mahabharat 10.7.61: उन्हें हविष्य रूप में दोनों भुजाएँ उठाए हुए निश्चल बैठे देखकर साक्षात् भगवान महादेवजी हँसकर बोले-॥61॥   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  10.7.61 
तमूर्ध्वबाहुं निश्चेष्टं दृष्ट्वा हविरुपस्थितम्।
अब्रवीद् भगवान् साक्षान्महादेवो हसन्निव॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
उन्हें हविष्य रूप में दोनों भुजाएँ उठाए हुए निश्चल बैठे देखकर साक्षात् भगवान महादेवजी हँसकर बोले-॥61॥
 
Seeing him sitting motionless with both his arms raised in a havishya form, Lord Mahadev in person said laughingly -॥ 61॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)