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mahabharat 10.7.34: वे पराक्रमी योद्धा बड़ी तेजी से दौड़ रहे थे, उछलते-कूदते, उछलते-कूदते। कुछ के सिर मुंडे हुए थे और कुछ के बाल हवा के झोंके से ऊपर की ओर उठे हुए थे।   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  10.7.34 
लङ्घयन्त: प्लवन्तश्च वल्गन्तश्च महारथा:।
धावन्तो जवना मुण्डा: पवनोद्‍धूतमूर्धजा:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वे पराक्रमी योद्धा बड़ी तेजी से दौड़ रहे थे, उछलते-कूदते, उछलते-कूदते। कुछ के सिर मुंडे हुए थे और कुछ के बाल हवा के झोंके से ऊपर की ओर उठे हुए थे।
 
Those mighty warriors were running at great speed, jumping, leaping and leaping. Some of them had shaved heads and some had their hair raised upwards due to the gust of wind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)