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mahabharat 10.7.15-16h: वहाँ अनेक महान गण प्रकट हुए, जो द्वीप के पर्वतों के समान ऊँचे थे। उनके मुख और नेत्र तेज से चमक रहे थे। उन गणों के अनेक पैर, सिर और भुजाएँ थीं। वे अपनी भुजाओं पर रत्नजड़ित विचित्र अंगद धारण किए हुए थे। उन सभी ने अपने हाथ ऊपर उठा रखे थे।   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  10.7.15-16h 
दीप्तास्यनयनाश्चात्र नैकपादशिरोभुजा:।
रत्नचित्राङ्गदधरा: समुद्यतकरास्तथा॥ १५॥
द्वीपशैलप्रतीकाशा: प्रादुरासन् महागणा:।
 
 
अनुवाद
वहाँ अनेक महान गण प्रकट हुए, जो द्वीप के पर्वतों के समान ऊँचे थे। उनके मुख और नेत्र तेज से चमक रहे थे। उन गणों के अनेक पैर, सिर और भुजाएँ थीं। वे अपनी भुजाओं पर रत्नजड़ित विचित्र अंगद धारण किए हुए थे। उन सभी ने अपने हाथ ऊपर उठा रखे थे।
 
There many great Ganas appeared, who were as tall as the mountains on the island. Their faces and eyes were glowing with radiance. Those Ganas had many legs, heads and arms. They were wearing strange Angad made of gems on their arms. All of them had raised their hands up.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)