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mahabharat 10.6.26-27h: मनुष्य का पुरुषार्थ भाग्य से बड़ा नहीं माना जाता। यदि भाग्यवश पुरुषार्थ करते हुए भी सफलता नहीं मिलती, तो वह धर्म के मार्ग से भटककर संकट में फँस जाता है॥26 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 10.6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  10.6.26-27h 
न हि दैवाद् गरीयो वै मानुषं कर्म कथ्यते।
मानुष्यं कुर्वत: कर्म यदि दैवान्न सिध्यति॥ २६॥
स पथ: प्रच्युतो धर्माद् विपदं प्रतिपद्यते।
 
 
अनुवाद
मनुष्य का पुरुषार्थ भाग्य से बड़ा नहीं माना जाता। यदि भाग्यवश पुरुषार्थ करते हुए भी सफलता नहीं मिलती, तो वह धर्म के मार्ग से भटककर संकट में फँस जाता है॥26 1/2॥
 
‘Human action (purushaarth) is not considered to be greater than destiny. If due to destiny one does not achieve success while making efforts, then one strays from the path of righteousness and gets trapped in trouble.॥ 26 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)