न वध: पूज्यते लोके सुप्तानामिह धर्मत:।
तथैवापास्तशस्त्राणां विमुक्तरथवाजिनाम्॥ ११॥
ये च ब्रूयुस्तवास्मीति ये च स्यु: शरणागता:।
विमुक्तमूर्धजा ये च ये चापि हतवाहना:॥ १२॥
अनुवाद
इस संसार में जो सोये हुए हैं, जिन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र रख दिए हैं, जिन्होंने अपने रथ और घोड़े खोल दिए हैं, जो 'मैं आपका हूँ' कह रहे हैं, जो शरण में आए हैं, जिनके बाल खुले हुए हैं और जिनके वाहन नष्ट हो गए हैं, उनको मारना धार्मिक दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता है। ॥11-12॥
In this world it is not considered good from the religious point of view to kill those who are asleep, who have put away their arms and weapons, who have untied their chariots and horses, who are saying "I am yours", who have taken refuge, whose hair are loose and whose vehicles have been destroyed. ॥11-12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥