श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  10.2.24-25h 
रागात् क्रोधाद् भयाल्लोभाद् योऽर्थानीहति मानव:॥ २४॥
अनीशश्चावमानी च स शीघ्रं भ्रश्यते श्रिय:।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपने मन को वश में नहीं रखता, दूसरों की उपेक्षा करता है तथा काम, क्रोध, भय या लोभ के कारण कुछ करने का प्रयत्न करता है, वह शीघ्र ही अपनी समृद्धि से वंचित हो जाता है ॥24 1/2॥
 
A person who does not control his mind and disregards others and tries to accomplish something out of passion, anger, fear or greed, very soon gets robbed of his prosperity. ॥24 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)