श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  10.2.18 
एवमेतदनादृत्य वर्तते यस्त्वतोऽन्यथा।
स करोत्यात्मनोऽनर्थानेष बुद्धिमतां नय:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जो इस सिद्धांत का अनादर करता है और इसके विपरीत आचरण करता है, अर्थात् जो भाग्य और पुरुषार्थ की सहायता स्वीकार नहीं करता और उनमें से केवल एक का ही अवलम्बन करता है, वह अपना ही अनिष्ट करता है। यही बुद्धिमानों की नीति है ॥18॥
 
Thus, whoever disrespects this principle and acts contrary to it, that is, who does not accept the help of destiny and human effort and relies on only one of them, causes harm to himself. This is the policy of the wise. ॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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