Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 10.2.17: परंतु जो इस संसार में कोई कर्म नहीं करता और केवल अपने कर्मों का फल भोगता है, वह प्रायः निन्दा का पात्र बनता है और दूसरों की घृणा का पात्र बनता है ॥17॥ | mahabharat अध्याय 10.2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना । mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अकृत्वा कर्म यो लोके फलं विन्दति धिष्ठित:।
स तु वक्तव्यतां याति द्वेष्यो भवति भूयश:॥ १७॥
अनुवाद
परंतु जो इस संसार में कोई कर्म नहीं करता और केवल अपने कर्मों का फल भोगता है, वह प्रायः निन्दा का पात्र बनता है और दूसरों की घृणा का पात्र बनता है ॥17॥
But he who does not do any work in this world and just enjoys the fruits of his actions is often condemned and becomes the object of hatred of others. ॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥