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mahabharat 10.18.21: इससे प्रसन्न होकर भगवान ने अपना क्रोध समुद्र में डाल दिया। हे प्रभु! वह क्रोध प्रचंड अग्नि में परिवर्तित हो गया और निरंतर उसका जल सोखता रहा।   |   mahabharat अध्याय 10.18: महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत‍्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 18: महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत‍्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  10.18.21 
तत: प्रसन्नो भगवान् स्थाप्य कोपं जलाशये।
स जलं पावको भूत्वा शोषयत्यनिशं प्रभो॥ २१॥
 
 
अनुवाद
इससे प्रसन्न होकर भगवान ने अपना क्रोध समुद्र में डाल दिया। हे प्रभु! वह क्रोध प्रचंड अग्नि में परिवर्तित हो गया और निरंतर उसका जल सोखता रहा।
 
After this, the pleased God placed his anger in the ocean. O Lord! That anger turns into a huge fire and continuously keeps on absorbing its water.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)