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mahabharat 10.18.13: तत्पश्चात् रुद्रदेव ने एक भयंकर बाण से यज्ञ के हृदय पर प्रहार किया, तब अग्नि सहित यज्ञ मृग का रूप धारण करके वहाँ से भाग गया ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 10.18: महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत‍्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 18: महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत‍्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.18.13 
तत: स यज्ञं विव्याध रौद्रेण हृदि पत्रिणा।
अपक्रान्तस्ततो यज्ञो मृगो भूत्वा सपावक:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् रुद्रदेव ने एक भयंकर बाण से यज्ञ के हृदय पर प्रहार किया, तब अग्नि सहित यज्ञ मृग का रूप धारण करके वहाँ से भाग गया ॥13॥
 
Thereafter, Rudradev struck the heart of the yagya with a fierce arrow. Then the Yagya along with the fire took the form of a deer and ran away from there. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)