श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 16: श्रीकृष्णसे शाप पाकर अश्वत्थामाका वनको प्रस्थान तथा पाण्डवोंका मणि देकर द्रौपदीको शान्त करना  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  10.16.12-13h 
भवित्री न हि ते क्षुद्र जनमध्येषु संस्थिति:।
पूयशोणितगन्धी च दुर्गकान्तारसंश्रय:॥ १२॥
विचरिष्यसि पापात्मन् सर्वव्याधिसमन्वित:।
 
 
अनुवाद
हे अभागे! तू लोक में नहीं रह सकेगा। तेरे शरीर से पीब और रक्त की दुर्गन्ध आती रहेगी; अतः तुझे दुर्गम स्थानों में आश्रय लेना पड़ेगा। हे पापी! तू नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित होकर इधर-उधर भटकेगा॥ 12 1/2॥
 
O wretched one! You will not be able to stay in the public. Your body will keep emitting the foul smell of pus and blood; therefore you will have to take shelter in inaccessible places. O sinful one! You will wander here and there, suffering from all kinds of diseases.॥ 12 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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