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mahabharat 10.15.5-6: ऐसा कहकर अर्जुन ने वह अस्त्र वापस ले लिया। युद्ध में उसे वापस लेना देवताओं के लिए भी कठिन था। युद्ध में एक बार वह दिव्यास्त्र छूट जाने पर पाण्डुपुत्र अर्जुन ही नहीं, अपितु स्वयं इन्द्र भी उसे वापस लेने में समर्थ नहीं थे ॥5-6॥   |   mahabharat अध्याय 10.15: वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 15: वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  10.15.5-6 
इत्युक्त्वा संजहारा स् त्रं पुनरेवं धनंजय:।
संहारो दुष्करस्तस्य देवैरपि हि संयुगे॥ ५॥
विसृष्टस्य रणे तस्य परमास्त्रस्य संग्रहे।
अशक्त: पाण्डवादन्य: साक्षादपि शतक्रतु:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर अर्जुन ने वह अस्त्र वापस ले लिया। युद्ध में उसे वापस लेना देवताओं के लिए भी कठिन था। युद्ध में एक बार वह दिव्यास्त्र छूट जाने पर पाण्डुपुत्र अर्जुन ही नहीं, अपितु स्वयं इन्द्र भी उसे वापस लेने में समर्थ नहीं थे ॥5-6॥
 
Saying this, Arjuna took back that weapon. It was difficult even for the gods to take it back in the war. Once that divine weapon was released in the war, not only Pandu's son Arjuna but even Indra himself was not capable of taking it back. ॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)