श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 15: वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.15.1 
वैशम्पायन उवाच
दृष्ट्वैव नरशार्दूल तावग्निसमतेजसौ।
गाण्डीवधन्वा संचिन्त्य प्राप्तकालं महारथ:।
संजहार शरं दिव्यं त्वरमाणो धनंजय:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - नरश्रेष्ठ! अग्नि के समान तेजस्वी उन दोनों महात्माओं को देखकर गाण्डीवधारी महारथी अर्जुन ने अपने उचित कर्तव्य का विचार करके बड़े वेग से अपने दिव्यास्त्र का प्रयोग आरम्भ किया॥1॥
 
Vaishampayanji says – Narashrestha! At the sight of those two great sages, who were as bright as fire, Arjuna, the great charioteer with Gandiva, thinking of his opportune duty, began to use his divine weapon with great speed. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)