श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 14: अश्वत्थामाके अस्त्रका निवारण करनेके लिये अर्जुनके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग एवं वेदव्यासजी और देवर्षि नारदका प्रकट होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.14.2 
अर्जुनार्जुन यद्दिव्यमस्त्रं ते हृदि वर्तते।
द्रोणोपदिष्टं तस्यायं काल: सम्प्रति पाण्डव॥ २॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन! अर्जुन! पाण्डुनन्दन! अब समय आ गया है कि आचार्य द्रोण के उपदेशानुसार तुम्हारे हृदय में स्थित दिव्यास्त्र का प्रयोग करो।
 
'Arjun! Arjun! Pandunandan! Now is the time to use the divine weapon which is present in your heart as preached by Acharya Drona. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)