श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 12: श्रीकृष्णका अश्वत्थामाकी चपलता एवं क्रूरताके प्रसंगमें सुदर्शनचक्र माँगनेकी बात सुनाते हुए उससे भीमसेनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेका आदेश देना  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  10.12.23-24 
सर्वयत्नबलेनापि गृह्णन्नेवमिदं तत:।
तत: सर्वबलेनापि यदैनं न शशाक ह॥ २३॥
उद्यन्तुं वा चालयितुं द्रौणि: परमदुर्मना:।
कृत्वा यत्नं परिश्रान्त: स न्यवर्तत भारत॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जब वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस पशु को न उठा सका, न हिला सका, तब द्रोणपुत्र मन में बहुत दुःखी हुआ। भरत! प्रयत्न करते-करते थककर उसने उसे उठाने का प्रयत्न छोड़ दिया।॥ 23-24॥
 
‘When he could not lift or move the animal even after trying his best and exerting all his strength, Drona's son became very sad in his heart. Bhaarat! Tired of trying, he gave up trying to pick it up.॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)