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श्लोक 10.1.69  |
भवतोस्तु यदि प्रज्ञा न मोहादपनीयते।
व्यापन्नेऽस्मिन् महत्यर्थे यन्न: श्रेयस्तदुच्यताम्॥ ६९॥ |
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| अनुवाद |
| यदि मोहवश आप दोनों की बुद्धि नष्ट न हो गई हो, तो इस महान् संकटकाल में हम लोगों को अपना बिगड़ा हुआ काम सुधारने के लिए क्या करना श्रेयस्कर होगा? कृपा करके हमें यह बताइए॥69॥ |
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| If the wisdom of both of you has not been destroyed by delusion, then in this time of great crisis, what would be the best thing for us to do to set right our spoilt work? Please tell us this.'॥ 69॥ |
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इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्रणायां प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥
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