श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 53-54h
 
 
श्लोक  10.1.53-54h 
परिश्रान्ते विदीर्णे वा भुञ्जाने वापि शत्रुभि:॥ ५३॥
प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रहर्तव्यं रिपोर्बलम्।
 
 
अनुवाद
‘यदि शत्रु सेना बहुत थकी हुई हो, बिखरी हुई हो, खा रही हो, कहीं जा रही हो या किसी विशेष स्थान में प्रवेश कर रही हो, तो भी विरोधियों को उस पर आक्रमण करना चाहिए ॥53 1/2॥
 
‘Even if the enemy army is very tired, dispersed, eating, going somewhere or entering a particular place, the opponents must still attack it. ॥ 53 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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