श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 51-52h
 
 
श्लोक  10.1.51-52h 
निन्दितानि च सर्वाणि कुत्सितानि पदे पदे॥ ५१॥
सोपधानि कृतान्येव पाण्डवैरकृतात्मभि:।
 
 
अनुवाद
‘अशुद्ध हृदय वाले पाण्डवों ने पग-पग पर ऐसे-ऐसे कर्म किये हैं जो निन्दा और घृणा के योग्य हैं। उन्होंने भी बहुत से छल-कपट के काम किये हैं॥ 51 1/2॥
 
‘The Pandavas, who had impure hearts, have committed such deeds at every step that are worthy of condemnation and hatred. They too have committed many deceitful deeds.॥ 51 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd