श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 46-47h
 
 
श्लोक  10.1.46-47h 
नाद्य शक्या मया हन्तुं पाण्डवा जितकाशिन:॥ ४६॥
बलवन्त: कृतोत्साहा: प्राप्तलक्ष्या: प्रहारिण:।
 
 
अनुवाद
पांडव इस समय विजय का आनंद मना रहे हैं। वे बलवान, उत्साही और आक्रमण में कुशल हैं। उन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। ऐसी स्थिति में, मैं आज उन्हें अपनी शक्ति से नहीं मार सकता।
 
The Pandavas are rejoicing in victory at this time. They are strong, enthusiastic and skilled in attacking. They have achieved their goal. In such a condition, I cannot kill them with my power today.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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