श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  10.1.24 
ततोऽस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे।
सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत॥ २४॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर जब सूर्यदेव सबसे ऊँचे पर्वत अस्ताचल पर पहुँचे, तब सम्पूर्ण जगत को अपनी गोद में धात्री के समान विश्राम देने वाली रात्रिदेवी सर्वत्र व्याप्त हो गईं॥24॥
 
Thereafter, when the Sun God reached Astachal, the highest mountain, the Night Goddess, who like a nurse gives rest to the entire world in her lap, became dominant everywhere. 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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