श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 99: महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 34-37
 
 
श्लोक  1.99.34-37 
शप्त्वा च तान् महाभागस्तपस्येव मनो दधे।
एवं स शप्तवान् राजन् वसूनष्टौ तपोधन:॥ ३४॥
महाप्रभावो ब्रह्मर्षिर्देवान् क्रोधसमन्वित:।
अथाश्रमपदं प्राप्तास्ते वै भूयो महात्मन:॥ ३५॥
शप्ता: स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमु:।
प्रसादयन्तस्तमृषिं वसव: पार्थिवर्षभ॥ ३६॥
लेभिरे न च तस्मात् ते प्रसादमृषिसत्तमात्।
आपवात् पुरुषव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
शाप देने के बाद उन महाभाग महर्षि ने पुनः तपस्या में मन लगाया । राजन ! तप के धनी ब्रह्मर्षि वशिष्ठ का प्रभाव बहुत बड़ा है । इसीलिए उन्होंने क्रोध में आकर देवता होते हुए भी उन आठों वसुओं को शाप दे दिया । तत्पश्चात् हमें शाप लगा है, यह जानकर वे वसु पुनः महामना वशिष्ठ के आश्रम में आये और उन महर्षि को प्रसन्न करने का प्रयत्न करने लगे । हे महाराज ! महर्षि आपव समस्त धर्मों के ज्ञान में निपुण थे । महाराज ! उन्हें प्रसन्न करने का भरसक प्रयत्न करने पर भी वसु उन महामुनि से उनका आशीर्वाद प्राप्त न कर सके । 34-37॥
 
After cursing him, that Mahabhaga Maharishi again concentrated on penance. Rajan! The influence of Brahmarishi Vashishtha, who is rich in penance, is huge. That is why in anger he cursed those eight Vasus despite being gods. After that, knowing that we have been cursed, Vasu again came to the ashram of Mahamana Vashishtha and started trying to please that Maharishi. The best! Maharishi Aapav was adept in the knowledge of all religions. Maharaj! Despite trying his best to please him, Vasu could not get his blessings from that great sage. 34-37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)