श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 99: महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 26-28
 
 
श्लोक  1.99.26-28 
प्रियं प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत् कथंचन।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देव्या: प्रियचिकीर्षया॥ २६॥
पृथ्वाद्यैर्भ्रातृभि: सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम्।
तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप॥ २७॥
ऋषेस्तस्य तपस्तीव्रं न शशाक निरीक्षितुम्।
हृता गौ: सा सदा तेन प्रपातस्तु न तर्कित:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'इससे ​​अधिक प्रिय और प्रिय कुछ भी मुझे नहीं है।' देवी के ये वचन सुनकर द्यो नामक वसु ने अपने भाइयों पृथु आदि की सहायता से उन्हें प्रसन्न करने के लिए उस गौ का हरण कर लिया। हे राजन! कमलदल के समान विशाल नेत्रों वाली अपनी पत्नी की प्रेरणा से द्यो ने उस गौ का हरण तो कर लिया; किन्तु उस समय वह महर्षि वसिष्ठ की घोर तपस्या का प्रभाव न देख सका, न यह सोच सका कि ऋषि के क्रोध के कारण वह स्वर्ग से च्युत हो जाएगा।
 
'There is nothing more dear or dearer to me than this.' Hearing these words of the Goddess, a Vasu named Dyo, with the help of his brothers Prithu and others, abducted the cow in order to please her. O King! Inspired by his wife who had eyes as big as lotus petals, Dyo abducted the cow; but at that time he could not see the effect of the intense penance of the great sage Vasishtha, nor could he think that due to the sage's anger he would fall from heaven.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)