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mahabharat 1.98.16: हे! इस बालक को मत मारो। तुम किसकी पुत्री हो? तुम कौन हो? अपने ही पुत्रों को क्यों मारती हो? हे पुत्र-हत्यारे! तुमने अपने पुत्र की हत्या का यह अत्यन्त निन्दनीय एवं घोर पाप किया है।॥16॥   |   mahabharat अध्याय 1.98: शान्तनु और गंगाका कुछ शर्तोंके साथ सम्बन्ध, वसुओंका जन्म और शापसे उद्धार तथा भीष्मकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 98: शान्तनु और गंगाका कुछ शर्तोंके साथ सम्बन्ध, वसुओंका जन्म और शापसे उद्धार तथा भीष्मकी उत्पत्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.98.16 
मा वधी: कस्य कासीति किं हिनत्सि सुतानिति।
पुत्रघ्नि सुमहत् पापं सम्प्राप्तं ते सुगर्हितम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे! इस बालक को मत मारो। तुम किसकी पुत्री हो? तुम कौन हो? अपने ही पुत्रों को क्यों मारती हो? हे पुत्र-हत्यारे! तुमने अपने पुत्र की हत्या का यह अत्यन्त निन्दनीय एवं घोर पाप किया है।॥16॥
 
‘Hey! Do not kill this child. Whose daughter are you? Who are you? Why do you kill your own sons? Son-killer! You have committed this most condemnable and grave sin of killing your son.’॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)