श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 95: दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  1.95.88 
इतिहासमिमं पुण्यमशेषत: श्रावयिष्यन्ति ये नरा: श्रोष्यन्ति वा नियतात्मानो विमत्सरा मैत्रा वेद-परास्तेऽपि स्वर्गजित: पुण्यलोका भवन्ति सततं देवब्राह्मणमनुष्याणां मान्या: सम्पूज्याश्च॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
जो पुण्यात्मा मनुष्य ईर्ष्या छोड़कर सबके प्रति मैत्रीभाव रखकर इस सम्पूर्ण पुण्य इतिहास को कहेगा या सुनेगा, वह स्वर्ग का अधिकारी होगा और देवताओं, ब्राह्मणों तथा मनुष्यों के लिए सदा आदरणीय एवं पूजनीय रहेगा ॥88॥
 
The virtuous person who will narrate or listen to this entire virtuous history and will narrate or listen to this entire virtuous history, giving up jealousy and having friendship towards everyone, will be entitled to heaven and will always be respectable and worshipable for gods, brahmins and humans. 88॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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