श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 95: दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 84-85
 
 
श्लोक  1.95.84-85 
स भगवता वासुदेवेनासंजातबलवीर्यपराक्रमोऽकालजातोऽस्त्राग्निना दग्धस्तेजसा स्वेन संजीवित:। जीवयित्वा चैनमुवाच—परिक्षीणे कुले जातो भवत्वयं परिक्षिन्नामेति॥ ८४॥
परिक्षित् खलु माद्रवतीं नामोपयेमे त्वन्मातरम्। तस्यां भवान् जनमेजय:॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
अश्वत्थामा के अस्त्र की अग्नि से झुलसकर वह समय से पहले ही पैदा हो गया था। उसमें बल, साहस और पराक्रम का अभाव था। परन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने अपने तेज से उसे पुनर्जीवित कर दिया। उसे पुनर्जीवित करने के बाद उन्होंने कहा, 'इस कुल के नाश के बाद इसका जन्म हुआ है; अतः यह बालक परीक्षित के नाम से विख्यात हो।' परीक्षित ने आपकी माता मद्रावती से विवाह किया, जिनके गर्भ से आपने जनमेजय नामक पुत्र के रूप में जन्म लिया। 84-85
 
He was born prematurely after being scorched by the fire of Ashwatthama's weapon. He lacked strength, courage and valour. But Lord Krishna revived him with his radiance. After reviving him, he said, 'He was born after the destruction of this clan; hence this child should be famous by the name of Parikshit.' Parikshit married your mother Madravati, from whose womb you were born as a son named Janamejaya. 84-85.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas