श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 95: दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 64-65
 
 
श्लोक  1.95.64-65 
माद्रीं खल्वलंकृतां दृष्ट्वा पाण्डुर्भावं चक्रे च तां स्पृष्ट्वैव विदेहत्वं प्राप्त:॥ ६४॥
तत्रैनं चिताग्निस्थं माद्री समन्वारुरोह उवाच कुन्तीम्; यमयोरप्रमत्तया त्वया भवितव्यमिति॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
एक दिन माद्री को सजी-धजी देखकर पाण्डु उस पर मोहित हो गये और उसका स्पर्श होते ही उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। तत्पश्चात् माद्री अपने पति के शव को अग्नि में रखकर चिता पर बैठ गयी और कुन्ती से बोली - 'बहन! मेरे जुड़वाँ बच्चों के पालन-पोषण में भी तुम्हें सदैव सावधानी बरतनी होगी।' ॥64-65॥
 
One day, seeing Madri all decked up, Pandu became attracted to her and as soon as he touched her, he left his body. Thereafter, Madri sat on the pyre with her husband's corpse lying in the fire and said to Kunti - 'Sister! You must always be careful in bringing up my twin children too.' ॥ 64-65॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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