श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 95: दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  1.95.60 
स बाणविद्ध उवाच पाण्डुम्—चरता धर्ममिमं येन त्वयाभिज्ञेन कामरसस्याहमनवाप्तकामरसो निहतस्तस्मात् त्वमप्येतामवस्थामासाद्यानवाप्तकामरस: पञ्चत्वमाप्स्यसि क्षिप्रमेवेति। स विवर्णरूपस्तथा पाण्डु: शापं परिहरमाणो नोपासर्पत भार्ये। वाक्यं चोवाच—॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
बाण से घायल होकर उस ऋषि ने पाण्डु से कहा—‘हे राजन! आप भी इस कामधर्म का आचरण करने वाले और कामतत्त्व को जानने वाले हैं, फिर भी आपने मुझे कामतत्त्व से तृप्त न होने की अवस्था में मार डाला है। अतः आप कामतत्त्व का स्वाद लेने से पूर्व ही इसी अवस्था में मर जाएँगे।’ यह सुनकर राजा पाण्डु दुःखी हो गए और शाप का पश्चाताप करते हुए अपनी पत्नियों का संग त्यागने लगे। उन्होंने कहा—॥60॥
 
Being wounded by the arrow, that sage said to Pandu—'O King! You are also the one who practices this sexual dharma and know the essence of sex, yet you have killed me in a state when I was not satiated with the essence of sex. Therefore, you will die in this state before you can taste the essence of sex.' Hearing this, King Pandu became sad and started avoiding the company of his wives, repenting the curse. He said—॥ 60॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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