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श्लोक 1.95.30  |
अत्रानुवंशश्लोकौ भवत:—
भस्त्रा माता पितु: पुत्रो येन जात: स एव स:।
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्था: शकुन्तलाम्॥ ३०॥ |
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| अनुवाद |
| यहाँ वंशक्रम का संकेत देने वाले दो श्लोक दिए गए हैं - 'माता धौंकनी के समान होती है। वास्तव में पुत्र अपने पिता का ही होता है; जिससे वह उत्पन्न होता है, वही उस बालक के रूप में प्रकट होता है। दुष्यंत! तुम अपने पुत्र का ध्यान रखो; शकुन्तला का अपमान मत करो।' |
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| Here are two verses indicating the lineage - 'A mother is like a bellows. In reality a son belongs to his father; the one from whom he is born appears in the form of that child. Dushyant! You should take care of your son; do not insult Shakuntala. |
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