श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 95: दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.95.26 
मतिनार: खलु सरस्वत्यां गुणसमन्वितं द्वादशवार्षिकं सत्रमाहरत्। समाप्ते च सत्रे सरस्वत्य-भिगम्य तं भर्तारं वरयामास। तस्यां पुत्रमजीजनत् तंसुं नाम॥ २६॥
 
 
अनुवाद
मतिनार ने सरस्वती नदी के तट पर उत्तम गुणों वाला बारह वर्षीय यज्ञ किया। यज्ञ पूर्ण होने पर सरस्वती उनके पास आईं और उन्हें पति रूप में वरण किया। मतिनार ने उनके गर्भ से तनसु नामक पुत्र को जन्म दिया॥26॥
 
Matinar performed the twelve-year yajna ritual of excellent qualities on the banks of the Saraswati. After its completion, Saraswati came to him and chose him as her husband. Matinar gave birth to a son named Tansu from her womb.॥26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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