सौतिरुवाच
एवमुक्ते तत: कन्या सोदतिष्ठत् प्रमद्वरा।
रुरोस्तस्यायुषोऽर्धेन सुप्तेव वरवर्णिनी॥ १६॥
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - धर्मराज के ऐसा कहते ही प्रम्राद द्वारा रुरु के आधे प्राणों से संयुक्त हुई वह सुन्दर ऋषि कन्या सोई हुई सी जाग उठी।
Ugrasravaji says - As soon as Dharamraj said this, the beautiful sage's daughter, united with half of Ruru's life by Pramrad, woke up as if she was asleep. 16.