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mahabharat 1.89.22: ‘हाय! यह बड़े दुःख की बात है कि ये पुण्यात्मा महाराज ययाति, जिनकी पवित्र कीर्ति थी और जो पुण्य कर्म करते थे, पुण्य के क्षीण होने के कारण नीचे गिर रहे हैं।’ तब गिरते हुए मैंने उनसे पूछा - ‘हे देवताओं! ऐसा क्या उपाय है कि मैं मुनियों में गिरूँ?’॥22॥   |   mahabharat अध्याय 1.89: ययाति और अष्टकका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 89: ययाति और अष्टकका संवाद  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.89.22 
अहो कष्टं क्षीणपुण्यो ययाति:
पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्ति:।
तानब्रुवं पतमानस्ततोऽहं
सतां मध्ये निपतेयं कथं नु॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘हाय! यह बड़े दुःख की बात है कि ये पुण्यात्मा महाराज ययाति, जिनकी पवित्र कीर्ति थी और जो पुण्य कर्म करते थे, पुण्य के क्षीण होने के कारण नीचे गिर रहे हैं।’ तब गिरते हुए मैंने उनसे पूछा - ‘हे देवताओं! ऐसा क्या उपाय है कि मैं मुनियों में गिरूँ?’॥22॥
 
'Oh! It is very sad that this pious Maharaja Yayati, who had a holy fame and was doing pious deeds, is falling down due to the depletion of his virtues.' Then while falling down I asked them - 'O Gods! What is the solution so that I fall among the saints?'॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)