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mahabharat 1.88.11: हे इन्द्र के समान पराक्रमी पुरुष! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिए। अब तुम्हें तुरन्त शोक और आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए। इस समय तुम मुनियों के पास उपस्थित हो। बल नामक दैत्य का संहार करने वाले इन्द्र भी अब तुम्हारे तेज को सहन करने में असमर्थ हैं।॥11॥   |   mahabharat अध्याय 1.88: ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 88: ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.88.11 
भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ
त्यजाशु चैवेन्द्रसमप्रभाव।
त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे
नालं प्रसोढुं बलहापि शक्र:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र के समान पराक्रमी पुरुष! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिए। अब तुम्हें तुरन्त शोक और आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए। इस समय तुम मुनियों के पास उपस्थित हो। बल नामक दैत्य का संहार करने वाले इन्द्र भी अब तुम्हारे तेज को सहन करने में असमर्थ हैं।॥11॥
 
O powerful man like Indra! Your fear should be dispelled. Now you should immediately give up sorrow and attachment. At this time you are present near the saints. Even Indra, the destroyer of the demon Bala, is now unable to bear your brilliance. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)