अध्याय 88: ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना
श्लोक 1: इन्द्र बोले- हे राजन! आप अपने समस्त कर्तव्यों का पालन करके घर छोड़कर वन में चले गए हैं। अतः हे नहुषपुत्र! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप किसके समान तप करते हैं?॥1॥
श्लोक 2: ययाति बोले - इन्द्र! मैं देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों और ऋषियों में किसी को भी ऐसा नहीं देखता जो तपस्या में मेरी बराबरी कर सके॥ 2॥
श्लोक 3: इन्द्र बोले - हे राजन! तुमने अपने समान, अपने से बड़े और अपने से छोटे, सबका बल जाने बिना ही सबका अपमान किया है। अतः इन पुण्य लोकों में तुम्हारे रहने की अवधि समाप्त हो गई है। क्योंकि (दूसरों की निन्दा करने के कारण) तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया है, अतः अब तुम यहाँ से नीचे गिरोगे।
श्लोक 4: ययातिन ने कहा- देवराज इन्द्र! यदि देवताओं, ऋषियों, गन्धर्वों और मनुष्यों आदि का अपमान करने से मेरा पुण्यलोक क्षीण हो गया है, तो मैं इन्द्रलोक से भ्रष्ट होकर ऋषियों में जाना चाहता हूँ॥4॥
श्लोक 5: इन्द्र ने कहा - राजा ययाति! यदि तुम यहाँ से गिरोगे, तो मुनियों के पास गिरोगे और वहाँ अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करोगे। यह सब जानकर तुम्हें फिर कभी अपने समान या बड़े लोगों का अपमान नहीं करना चाहिए॥5॥
श्लोक 6: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! तत्पश्चात् राजा ययाति देवराज इन्द्र के भोगने योग्य पुण्य लोकों का परित्याग करके नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियों में श्रेष्ठ अष्टकने ने उन्हें गिरते हुए देखा। वे उत्तम धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने ययाति से कहा ॥6॥
श्लोक 7: अष्टक ने पूछा - हे इन्द्र के समान सुन्दर रूप वाले युवक, तुम कौन हो? तुम अपने तेज से अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे हो। तुम आकाश में उड़ते हुए ग्रहों में श्रेष्ठ सूर्य के समान बादलों के सघन अंधकार से आच्छादित आकाश से कैसे गिर रहे हो?॥7॥
श्लोक 8: आपका तेज सूर्य और अग्नि के समान है। आप अत्यन्त शक्तिशाली प्रतीत होते हैं। आपको सूर्य के मार्ग में गिरते हुए देखकर हम सब मोहित हो जाते हैं और इस बात पर विचार करने लगते हैं कि 'यह क्या गिर रहा है?'॥8॥
श्लोक 9: आप इन्द्र, सूर्य और विष्णु के समान पराक्रमी हैं। आपको आकाश में स्थित देखकर हम सब अब आपके निकट यह जानने आए हैं कि आपके पतन का वास्तविक कारण क्या है?॥9॥
श्लोक 10: हम आपसे पहले कुछ पूछने का साहस नहीं कर सकते और आप भी हमारा परिचय नहीं पूछते; हम कौन हैं? इसलिए मैं आपसे पूछती हूँ। हे मनोहर रूप वाले महापुरुष! आप किसके पुत्र हैं? और यहाँ किसलिए आए हैं?॥10॥
श्लोक 11: हे इन्द्र के समान पराक्रमी पुरुष! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिए। अब तुम्हें तुरन्त शोक और आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए। इस समय तुम मुनियों के पास उपस्थित हो। बल नामक दैत्य का संहार करने वाले इन्द्र भी अब तुम्हारे तेज को सहन करने में असमर्थ हैं।॥11॥
श्लोक 12: हे देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी महापुरुष! सुख से वंचित पुण्यात्मा पुरुषों के लिए संत ही परम आश्रय हैं। वे पुण्यात्मा पुरुष जो समस्त चराचर प्राणियों पर शासन करते हैं, यहाँ एकत्रित हुए हैं। आप अपने जैसे पुण्यात्माओं सहित संतों के बीच स्थित हैं॥12॥
श्लोक 13: जैसे अग्नि में ताप देने की शक्ति है, पृथ्वी में बोए गए बीजों को धारण करने की शक्ति है, सूर्य में प्रकाश देने की शक्ति है, वैसे ही अतिथि में ही संतों पर शासन करने की शक्ति है ॥13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥