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श्लोक 1.86.17  |
एकपाद: स्थितश्चासीत् षण्मासाननिलाशन:।
पुण्यकीर्तिस्तत: स्वर्गे जगामावृत्य रोदसी॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| इसके बाद वे छः महीने तक वायु-श्वास लेकर एक पैर पर खड़े रहे। तत्पश्चात् पुण्यकीर्ति महाराज ययाति पृथ्वी और आकाश में अपना यश फैलाकर स्वर्गलोक को चले गए। 17॥ |
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| After this, he stood on one leg after breathing air for six months. Thereafter, Punyakirti Maharaj Yayati went to heaven after spreading his fame on earth and sky. 17॥ |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते षडशीतितमोऽध्याय:॥ ८६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८६॥
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