श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 86: वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.86.10 
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तमां कथाम्।
दिवि चेह च पुण्यार्थां सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन बोले, "जनमेजय! ययाति की महान कथा इस लोक में तथा स्वर्ग में भी पुण्यदायी है। यह समस्त पापों का नाश करने वाली है। मैं इसे तुम्हें सुना रहा हूँ।"
 
Vaishampayana said, 'Janamejaya! The great story of Yayati is meritorious in this world as well as in heaven. It destroys all sins. I am narrating it to you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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