श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना  »  श्लोक 7-10
 
 
श्लोक  1.85.7-10 
स सम्प्राप्य शुभान् कामांस्तृप्त: खिन्नश्च पार्थिव:।
कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिप:॥ ७॥
परिसंख्याय कालज्ञ: कला: काष्ठाश्च वीर्यवान्।
यौवनं प्राप्य राजर्षि: सहस्रपरिवत्सरान्॥ ८॥
विश्वाच्या सहितो रेमे व्यभ्राजन्नन्दने वने।
अलकायां स कालं तु मेरुशृङ्गे तथोत्तरे॥ ९॥
यदा स पश्यते कालं धर्मात्मा तं महीपति:।
पूर्णं मत्वा तत: कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वे राजा शुभ भोगों को पाकर संतुष्ट और प्रसन्न रहते थे; किन्तु जब वे सोचते थे कि ये हजार वर्ष भी पूरे हो जाएँगे, तब उन्हें बड़ा दुःख होता था। काल के सत्य को जानने वाले महाबली राजा ययाति एक-एक कला और काष्ठ की गणना करके एक-एक हजार वर्ष की अवधि का स्मरण करते थे। हजार वर्ष की युवावस्था प्राप्त करके राजर्षि ययाति नंदनवन में अप्सरा विश्वाची के साथ भोग-विलास और शोभा पाते थे। वे अलकापुरी में तथा उत्तर दिशा में मेरु के शिखर पर भी इच्छानुसार विहार करते थे। जब धर्मात्मा राजा ने देखा कि अब समय पूरा हो गया है, तब वे अपने पुत्र पुरु के पास आकर बोले -॥7-10॥
 
Those kings used to be satisfied and happy after getting auspicious pleasures; but when they thought that these thousand years will also be completed, then they used to feel very sad. Knowing the truth of time, the mighty king Yayati used to remember the period of one thousand years by counting each 'kala' and 'kashta'. After getting the youth of thousand years, Rajrishi Yayati used to enjoy and shine with the Apsara Vishwachi in Nandanvan. He used to roam in Alakapuri and also on the peak of Meru in the north direction as per his wish. When the righteous king saw that the time was now completed, then he came to his son Puru and said -॥ 7-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)