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mahabharat 1.83.8: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार आपस में बातें करके दोनों हँस पड़े। देवयानी को लगा कि शर्मिष्ठा ठीक कह रही है, इसलिए वह चुपचाप महल में चली गई।   |   mahabharat अध्याय 1.83: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 83: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.83.8 
वैशम्पायन उवाच
अन्योन्यमेवमुक्त्वा तु सम्प्रहस्य च ते मिथ:।
जगाम भार्गवी वेश्म तथ्यमित्यवजग्मुषी॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार आपस में बातें करके दोनों हँस पड़े। देवयानी को लगा कि शर्मिष्ठा ठीक कह रही है, इसलिए वह चुपचाप महल में चली गई।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Both of them laughed after talking to each other in this manner. Devayani felt that Sharmishtha was right; hence she quietly went to the palace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)