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mahabharat 1.83.4: शुचिस्मिते! मैं कोई भी ऐसा कार्य नहीं करती जो न्याय के विरुद्ध हो। मैं तुमसे सत्य कहती हूँ कि मैंने उस ऋषि से एक बालक को जन्म दिया है।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.83: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 83: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.83.4 
नाहमन्यायत: काममाचरामि शुचिस्मिते।
तस्मादृषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
शुचिस्मिते! मैं कोई भी ऐसा कार्य नहीं करती जो न्याय के विरुद्ध हो। मैं तुमसे सत्य कहती हूँ कि मैंने उस ऋषि से एक बालक को जन्म दिया है।॥4॥
 
Shuchismite! I do not commit any act which is against justice. I am telling you the truth that I have given birth to a child from that sage. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)