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श्लोक 1.82.d1-d2  |
(अशोकवनिकामध्ये देवयानी समागता।
शर्मिष्ठया सा क्रीडित्वा रमणीये मनोरमे॥
तत्रैव तां तु निर्दिश्य राज्ञा सह ययौ गृहम्।
एवमेव सह प्रीत्या मुमुदे बहुकालत:॥ ) |
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| अनुवाद |
| देवयानी ययाति के साथ परम सुन्दर एवं मनोहर अशोक वाटिका में आती और शर्मिष्ठा के साथ वन में विचरण करने के पश्चात उसे वहीं छोड़कर राजा के साथ महल में चली जाती। इस प्रकार वह दीर्घकाल तक सुखपूर्वक जीवन का आनन्द लेती रही। |
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| Devayani used to come to the most beautiful and charming Ashok Vatika with Yayati and after roaming in the forest with Sharmishtha, she used to leave her there and go to the palace with the king. In this way she continued to enjoy life happily for a long time. |
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