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श्लोक 1.82.7  |
ऋतुकालश्च सम्प्राप्तो न च मेऽस्ति पतिर्वृत:।
किं प्राप्तं किं नु कर्तव्यं किं वा कृत्वा कृतं भवेत्॥ ७॥ |
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| अनुवाद |
| 'मैं रजस्वला हो गई हूँ, परन्तु अभी तक पति का वरण नहीं किया है। यह कैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है? अब मुझे क्या करना चाहिए अथवा क्या करने से पुण्य होगा?॥ 7॥ |
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| 'I have attained my menstrual period but I have not yet chosen a husband. What kind of situation has arisen? What should I do now or what will be good (virtuous) by doing it?॥ 7॥ |
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